Achyutam keshvam

हम समय शम्भु के चाप चढ़े सायक हैं. हम पीड़ित मानवता के नव नायक हैं हम मृतकों को संजीवन मन्त्र सुनाते हम गीत नहीं युग गीता के गायक हैं

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एक खराब कविता

Posted On 17 Mar, 2017 कविता में

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हरी डाल के खग हर उगते
रवि को करें प्रणाम .
फुल्ली ठलुआ उठाधरी को
छोड़ न दूजा काम .
तमगे चहिये माला चहिये
लगे एक धुनधुनियाँ में
कैसे-कैसे लोग बसे हैं दुनियाँ में .१.
-
चातक चन्द्र लजाएँ एसी
प्रीती जताएँ भारी .
छण में कोप करें चौराहे
पर ही कर दें ख्वारी .
इनकी प्रीती बसी है उनके
स्वारथ की झुनझुनियाँ में .
कैसे-कैसे लोग बसे हैं दुनियाँ में.२.
-
रंग पूर्णत:गिरगिटिया है
गैंडे जैसी खाल .
सूअर केश धरे नयनन में
खूब बजाएं गाल .
कमी हजार निकालें पल में ,
बड़े-बड़े गुन-गुनियाँ में .
कैसे-कैसे लोग बसे हैं दुनियाँ में.३.
-
उज्ज्वलतम आवरण छिपाए
जिनकी रंगत काली .
आगे करें बढ़ाई लेकिन ,
पीछे देंवे गाली .
कोई मरे चाहे तो जीवे ,
ये अपनी धुन-धुनियाँ में .
कैसे-कैसे लोग बसे हैं दुनियाँ में.४.



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