Achyutam keshvam

हम समय शम्भु के चाप चढ़े सायक हैं. हम पीड़ित मानवता के नव नायक हैं हम मृतकों को संजीवन मन्त्र सुनाते हम गीत नहीं युग गीता के गायक हैं

96 Posts

251 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 14295 postid : 1293459

मैं भारत हूँ मैंने विष भी सोम सुधा के संग पिया है

Posted On 15 Nov, 2016 Hindi Sahitya, Social Issues, कविता में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

मुक्ति हेतु यूँ धार धर्म को अर्थ काम के संग जिया है .
मैं भारत हूँ मैंने विष भी सोम सुधा के संग पिया है .
-
अवरोधों को चूर्ण बनाती धाती क्षिप्रा मतवाली .
हरती पाप कलुष धरती के अंक समा नाले नाली .
हहराती -लहराती नदिया कहलाती गंगा मैया ,
नीचे झुक नीचों को अपना कर होती महिमावाली .
जो-जो संग लगा गंगा के उसको अपना अंग किया है .
मैं भारत हूँ मैंने विष भी सोम सुधा के संग पिया है .
-
यहाँ श्याम ने धेनु चराई वंशी यहीं बजाई रे .
गुंजन उर में धार हवाएं अभी तलक बौराई रे .
ढूँढ-ढूढ़ कर जग में हारा जब पाया तो क्या पाया ,
बैठ राधिका चरण चांपता तीन लोक का साईं रे .
इसी अवनितल पर मोहन ने रास राधिका संग किया है .
मैं भारत हूँ मैंने विष भी सोम सुधा के संग पिया है .
-
राज-पाट-सुत-दारा-रिश्ते-नाते-सारे त्याग चला .
फिर समाधि में लीन अहर्निश तप-ज्वाला में खूब जला .
त्याग-भोग द्वय तार अधिक ढीले या कसे नहीं होते ,
तब ही जीवन वीणा बजती बोध हुआ तो पता चला .
मध्यम मार्ग चुना गौतम ने चकित समूचा संघ किया है .
मैं भारत हूँ मैंने विष भी सोम सुधा के संग पिया है .
-
जैसे मथुरा काशी वैसे खजुराहो मेरी थाती है .
है स्नेह सभी में मेरा भिन्न-भिन्न दीपक बाती है .
लिखे रुक्मिणी या शकुंतला त्रेता में द्वापर कलियुग में ,
भाव सभी में एक निहित है केवल अलग-अलग पाती है .
क्या पछुआ क्या पुरवा रे जब उड़ा बसंती रंग दिया है .
मैं भारत हूँ मैंने विष भी सोम सुधा के संग पिया है .
-अच्युतम केशवम



Tags:         

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

6 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
December 11, 2016

प्रिय अच्युत कविता की पंक्तियों में पूरी संस्कृति पढा दी मुक्ति हेतु यूँ धार धर्म को अर्थ काम के संग जिया है . मैं भारत हूँ मैंने विष भी सोम सुधा के संग पिया है .अति सुंदर

    achyutamkeshvam के द्वारा
    December 11, 2016

    आभार,प्रणाम

Jitendra Mathur के द्वारा
November 17, 2016

इन्हीं दिनों हरिवंशराय बच्चन जी की आत्मकथा के पारायण के मध्य उनकी अनेक सुंदर कविताओं के रसास्वादन का मुझे अवसर मिला (जो उन्होंने आत्मकथा में विभिन्न स्थानों पर यथापेक्षा उद्धृत की हैं) । आपकी यह कविता भी स्वरूप एवं गुणवत्ता दोनों ही दृष्टियों से उनकी कविताओं की ही श्रेणी में आती है । अब सोम-सुधा तो जिन भरतवंशियों के भाग्य में थी, उन्होंने उसका रसपान कर लिया । वर्तमान युग में तो भारतवासियों के भाग्य में दिन-प्रतिदिन गरल ही आ रहा है जिसे पीने को वे विवश हैं । आपकी सदा की ही भांति सुंदर कविता एवं हृदय-विजयिनी के लिए आपका अभिनंदन ।

    achyutamkeshvam के द्वारा
    December 11, 2016

    आभार आपका

ashasahay के द्वारा
November 16, 2016

वाह बहुत सुन्दर।


topic of the week



latest from jagran