Achyutam keshvam

हम समय शम्भु के चाप चढ़े सायक हैं. हम पीड़ित मानवता के नव नायक हैं हम मृतकों को संजीवन मन्त्र सुनाते हम गीत नहीं युग गीता के गायक हैं

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अरे!विश्व विनती का किंचित ध्यान धरो अर्घ्य दान दो नहीं नवोदित सूरज को

Posted On 5 Oct, 2016 Hindi Sahitya, social issues, कविता में

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रिक्त चषक रहने दो मेरा अभी सुनो
चस्का पड़ जाए न मादक धारों का
अभी लोटने दो धरती की रेणू में
स्वप्न जगाओ नहीं नयन में तारों का
अभी कहाँ दृष्टव्य कहो अक्षत सुवास
जो करता है पृथक -पृथक चन्दन रज को
अरे!विश्व विनती का किंचित ध्यान धरो
अर्घ्य दान दो नहीं नवोदित सूरज को .१.
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एकबार पर फैलाकर उड़ गया अगर
फिर न लौटकर सम्पाती सा आना है
अभी नीड़ से अस्फुट स्वर में गाने दो
कल सूरज चंदा का पता लगाना है
अभी कहाँ वह शक्ति भुजाओं में ,कर दे
भू-लुंठित चींटी से लेकर जो गज को
अरे!विश्व विनती का किंचित ध्यान धरो
अर्घ्य दान दो नहीं नवोदित सूरज को .२.
-
सदा सुपूजित सूरज अध्:पतित होते
कोटि -कोटि हतभाग्य जा चुके अस्ताचल
किसे समय है फिर जो उनकी सुधि लेवे
विश्व प्रणाम करेगा नव सूरज को कल
देव शीश पर चढकर है जो इठलाया
कल घूरे पर देखोगे उस पंकज को
अरे!विश्व विनती का किंचित ध्यान धरो
अर्घ्य दान दो नहीं नवोदित सूरज को ३.
-
प्रखर वहिन जो धधक रही उर वेदी में
छिड़क रहे क्यों पुन:पुन:ये शीतल जल
कर पाओ तो केवल यह उपकार करो
आलोचन समिधा दे कर दो सम्वृत बल
व्यंग्य करो मत कह सुन्दर सर्वांग पूर्ण
अष्टावक्री देह न भूले निज कज को
अरे!विश्व विनती का किंचित ध्यान धरो
अर्घ्य दान दो नहीं नवोदित सूरज को .४.



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
October 6, 2016

गूढ़ार्थ है आपकी इस कविता का अच्युत जी । हृदय के किसी बिन्दु पर प्रच्छन्न रूप से प्रहार कर रहे हैं इसके शब्द । आपकी लेखनी की शक्ति आपका भाषा-ज्ञान नहीं वरन आपका गहन चिंतन एवं सत्यनिष्ठा से ओतप्रोत अभिव्यक्ति है । इस कविता की विषय-वस्तु पर कोई टिप्पणी करने के स्थान पर मैं केवल आपकी लेखनी को नमन करता हूँ ।


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