Achyutam keshvam

हम समय शम्भु के चाप चढ़े सायक हैं. हम पीड़ित मानवता के नव नायक हैं हम मृतकों को संजीवन मन्त्र सुनाते हम गीत नहीं युग गीता के गायक हैं

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पीपल की डाली पर बुलबुल फिर गाती है

Posted On: 27 Aug, 2016 कविता,Hindi Sahitya,Others में

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पीपल की डाली पर
तिनकों को जोड़-जोड़
स्वप्नवत सलोना सा
घोंसला बनाती है
-
पतझड़ का गीत नहीं
बसंती तराना है
हर सुबह -शाम ढले
बुलबुल जो गाती है
-
निकलेंगे डिम्ब तोड़
उसके प्रतिबिम्ब कई
सोच यही विह्वल -
निज आँखों को मींचती
-
सांझ गगन रोली में
बोली की तूलिका
डोब-डोब कल्पना से
अल्पनायें खींचती
-
जीवन की बीन छीन
मृत्यु के हाथों से
फिर -फिर सहेज नीड़
बैठी बजाती है
-
होड़ लिए अंधड़ से
बातों ही बातों से
पीपल की डाली पर
बुलबुल फिर गाती है
-
अच्युतम केशवम की कविताएँ



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
August 31, 2016

आज आपकी यह कविता पढने को मिली अति सुंदर भाव

    achyutamkeshvam के द्वारा
    September 3, 2016

    आपके प्रोत्साहन हेतु ह्रदयतल से आभार

Jitendra Mathur के द्वारा
August 30, 2016

बहुत सुंदर अच्युत जी । भावभीनी और जिजीविषा से परिपूर्ण कविता ।


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