Achyutam keshvam

हम समय शम्भु के चाप चढ़े सायक हैं. हम पीड़ित मानवता के नव नायक हैं हम मृतकों को संजीवन मन्त्र सुनाते हम गीत नहीं युग गीता के गायक हैं

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वृक्ष तेरी रागमयता आज मुझ पर झर रही है

Posted On 12 Aug, 2016 कविता में

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वृक्ष तेरी रागमयता ,
आज मुझ पर झर रही है .
तन समूचा भीजता है,
मन सुवासित कर रही है .
-
हरीतिमा श्यामल तुम्हारी,
इन्द्रधनुषों को लजाती.
धर प्रलय के शीश पर पग,
बीन जीवन की बजाती.
गंधमय वानस्पतिकता ,
चर-अचर में तिर रही है .
वृक्ष तेरी रागमयता ,
आज मुझ पर झर रही है .(१)
-
सात्विकी मकरंद छाया,
ओढ़नी सी ओढ़ लूं मैं .
तव सुमन की सौम्यता से,
मृदुल नाता जोड़ लूं मैं .
नीड़कामी लघु-विहंगिनी ,
शाख पर तृण धर रही है .
वृक्ष तेरी रागमयता ,
आज मुझ पर झर रही है .(२)



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
August 31, 2016

श्री अच्युत जी ज्यादातर कविता की बारीकियां मेरी समझ में कम ही आती हैं मुझे रूखे राजनीतिक विषय पसंद रहे हैं लेकिन आपकी पंक्तिया मुझे विभोर कर देती हैं |आप ऐसे ही सुंदर भाव बिखेरते रहें

    achyutamkeshvam के द्वारा
    September 3, 2016

    आपके प्रोत्साहन हेतु ह्रदयतल से आभार

Jitendra Mathur के द्वारा
August 13, 2016

अति-सुंदर अच्युत जी । अत्यंत मनोहारी कविता है यह आपकी ।


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