Achyutam keshvam

हम समय शम्भु के चाप चढ़े सायक हैं. हम पीड़ित मानवता के नव नायक हैं हम मृतकों को संजीवन मन्त्र सुनाते हम गीत नहीं युग गीता के गायक हैं

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हिन्दी नभ सस्मित विकसित प्रेमचन्द -जन्म जयंती पर नमन

Posted On: 31 Jul, 2016 कविता,Special Days,Hindi Sahitya में

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पारतन्त्रय की दमन और शोषण की . वह विभा गहन दुर्जन उलूक तोषण की . - द्वितीया चन्द्र सरीखे तिमिर सघन में . दल बढ़े विघ्न हिन्दी साहित्य गगन में . - मजदूर कृषक स्त्री दरिद्र की पीड़ा . मिटे ,मिलें अधिकार उठाया बीड़ा . - बन गयी लेखनी शस्त्र क्रान्तिधर्मी का . कथा क्षेत्र रण-अंगण रणकर्मी का . - साहित्य नहीं है कर्म मनोरंजन का . साहित्यिक का धर्म रूढ़ि-भंजन का . - कलम नहीं कर कलम-कृपाण कहो रे . पाखण्ड भित्तीयाँ बढ़कर आज ढहो रे . - कर सके न कंटक हीन प्रगति के पथ को . श्रेयस्कर तज चलो देह के रथ को . - कथा-कथा में व्यथा यही अभिव्यक्तिमयी. चली हवा परिवर्तन की अति शक्तिमयी . - इन्द्रधनुष ले इंद्र उपन्यासों का . ऋण चुकती करता भू को सांसों का . - ज्ञान गवाक्ष खुले पड़े थे बंद . हिन्दी नभ सस्मित विकसित प्रेमचन्द
पारतन्त्रय की दमन और शोषण की .
वह विभा गहन दुर्जन उलूक तोषण की .
-
द्वितीया चन्द्र सरीखे तिमिर सघन में .
दल बढ़े विघ्न हिन्दी साहित्य गगन में .
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मजदूर कृषक स्त्री दरिद्र की पीड़ा .
मिटे ,मिलें अधिकार उठाया बीड़ा .
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बन गयी लेखनी शस्त्र क्रान्तिधर्मी का .
कथा क्षेत्र रण-अंगण रणकर्मी का .
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साहित्य नहीं है कर्म मनोरंजन का .
साहित्यिक का धर्म रूढ़ि-भंजन का .
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कलम नहीं कर कलम-कृपाण कहो रे .
पाखण्ड भित्तीयाँ बढ़कर आज ढहो रे .
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कर सके न कंटक हीन प्रगति के पथ को .
श्रेयस्कर तज चलो देह के रथ को .
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कथा-कथा में व्यथा यही अभिव्यक्तिमयी.
चली हवा परिवर्तन की अति शक्तिमयी .
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इन्द्रधनुष ले इंद्र उपन्यासों का .
ऋण चुकती करता भू को सांसों का .
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ज्ञान गवाक्ष खुले पड़े थे बंद .
हिन्दी नभ सस्मित विकसित प्रेमचन्द



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
August 31, 2016

श्री स्वर्गीय प्रेमचंद के विषय में इससे अच्छा क्या लिखा जा सकता है ज्ञान गवाक्ष खुले पड़े थे बंद . हिन्दी नभ सस्मित विकसित प्रेमचन्द

    achyutamkeshvam के द्वारा
    September 3, 2016

    आपके प्रोत्साहन हेतु ह्रदयतल से आभार

rameshagarwal के द्वारा
August 6, 2016

जय श्री  राम अच्युतमकेशवन जी मुंशी प्रेम चन्द्र जी ने आपने उप्यायासो के द्वारा  हिंदी  साहित्य की अटूट सेवा की और जिस सुन्दरता से समाज की विभिन्न समस्याओ को वर्णन किया उसकी तारीफ के लिए शब्द भी कम पद जाते आपकी कविता द्वारा उनका चित्रण दिल को छूने वाले .आप  को  ओसके लिए सादुवाद

    achyutamkeshvam के द्वारा
    August 17, 2016

    बहुत बहुत आभार सर

Jitendra Mathur के द्वारा
July 31, 2016

अद्भुत श्रद्धांजलि दी है अच्युत जी आपने उपन्यास सम्राट प्रेमचंद जी को । मैंने उनके साहित्य का अधिकांश भाग पढ़ा है एवं उनके प्रति आपके काव्यमय भावोद्गारों से मैं पूर्ण सहमत ही नहीं, अभिभूत हूँ । कलम के उस निर्भीक सिपाही को नमन जबकि हार्दिक आभार एवं अभिनंदन आपका ।


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