Achyutam keshvam

हम समय शम्भु के चाप चढ़े सायक हैं. हम पीड़ित मानवता के नव नायक हैं हम मृतकों को संजीवन मन्त्र सुनाते हम गीत नहीं युग गीता के गायक हैं

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श्रम के विजय गीत गुंजित हो खेतों में खलिहान में

Posted On: 12 Mar, 2016 कविता,Hindi Sahitya में

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अब तो अरुणोदय हो.
नूतन सूर्य उदय हो.
-
उदयाचल से दिगदिगन्त तक
फैली अभिनव लालिमा
दीप करो विश्राम ज्योति से
अधिक तुम्हारी कालिमा
शरणापन्न तिमिर से रण का
अब न अधिक अभिनय हो
अब तो अरुणोदय हो.
नूतन सूर्य उदय हो.
-
अब तो धूप धरा पर उतरे
चढ़ किरणों की पालकी
फिर आँगन में सजे रंगोली
मोती और गुलाल की
खिल जाये प्राची का पाटल
ये उपवन अक्षय हो
अब तो अरुणोदय हो.
नूतन सूर्य उदय हो.
-
ताले खुलें सांकरें चटके
निशि के कारागार के
ऐसी हवा बहे घर देहली
कर दे स्वच्छ बुहार के
मुझसे तुझको तुझसे मुझको
नहीं तनिक भी भय हो
अब तो अरुणोदय हो.
नूतन सूर्य उदय हो.
-
पर फैलाये उड़ें चिड़कुली
विस्तृत नील वितान में
श्रम के विजय गीत गुंजित हो
खेतों में खलिहान में
वृन्दावनी वेणु की ध्वनि में
जन गण मन तन्मय हो
अब तो अरुणोदय हो.
नूतन सूर्य उदय हो.



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
March 15, 2016

काश इस कविता में देखा गया आपका प्रत्येक स्वप्न साकार हो जाए । सत्य ही अरुणोदय हो जाए, नूतन सूर्योदय हो जाए । आप एक अत्यंत उत्कृष्ट कोटि के कवि हैं अच्युत जी । आपकी ऐसी असाधारण रचनाएं पढ़ पाने को मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ ।

    achyutamkeshvam के द्वारा
    March 18, 2016

    उत्साहवर्धन का आभार

jlsingh के द्वारा
March 12, 2016

बहुत ही सुन्दर उच्च स्तर की कविता पढ़कर मन आनंदित हो उठा. // पर फैलाये उड़ें चिड़कुली विस्तृत नील वितान में श्रम के विजय गीत गुंजित हो खेतों में खलिहान में वृन्दावनी वेणु की ध्वनि में जन गण मन तन्मय हो अब तो अरुणोदय हो. नूतन सूर्य उदय हो. बहुत ही सुन्दर !

    achyutamkeshvam के द्वारा
    March 18, 2016

    उत्साहवर्धन हेतु आभार


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