Achyutam keshvam

हम समय शम्भु के चाप चढ़े सायक हैं. हम पीड़ित मानवता के नव नायक हैं हम मृतकों को संजीवन मन्त्र सुनाते हम गीत नहीं युग गीता के गायक हैं

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है और बात झरना बनकर ये जल अबतक बह सका नहीं

Posted On: 18 Jan, 2016 Others,social issues,Hindi Sahitya में

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मेरा संसार तुम्हीं से है
मुझको बस प्यार तुम्हीं से है
है और बात उन्मुक्त गात होकर
तुमसे कह सका नहीं
पर बिना कहे रह सका नहीं
………………………….
ये अहंकार की प्रतिमा सा
जो कुलिश गात पर्वत कठोर
इसमें रहनी है शेष कहाँ
जीवन स्पंदन की हिलोर
पर इसके अन्तर में जल है
जो करता कल-कल छल-छल है
है और बात झरना बनकर
ये जल अबतक बह सका नहीं
मेरा संसार तुम्हीं से है
मुझको बस प्यार तुम्हीं से है
है और बात उन्मुक्त गात होकर
तुमसे कह सका नहीं
पर बिना कहे रह सका नहीं (1)
…………………………………….
काँटों की हरी शाल ओढ़े
ये चटख शोख रंग का गुलाब
श्री सामंतों सी ठसक लिए
आँखों में सत्ता का रुआब
पर इसके भीतर भी पराग
जो सतत गा रहा सुरभि राग
है और बात आगे बढकर
पर तितली के गह सका नहीं
मेरा संसार तुम्हीं से है
मुझको बस प्यार तुम्हीं से है
है और बात उन्मुक्त गात होकर
तुमसे कह सका नहीं
पर बिना कहे रह सका नहीं (2)
………………………………………….
ये पांचजन्य घन-गर्जन स्वर
करता अरिमन में भी भरता
डगमग –डगमग धरती डोले
जब समरांगण में पग धरता
पर उर में गूँज रही वेणू
राधा-जसुदा-गोकुल-धेनू
है और बात वह द्वारिकेश
वृन्दावन में रह सका नहीं
मेरा संसार तुम्हीं से है
मुझको बस प्यार तुम्हीं से है
है और बात उन्मुक्त गात होकर
तुमसे कह सका नहीं
पर बिना कहे रह सका नहीं (3)



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bhola nath Pal के द्वारा
February 22, 2016

आपकी साडी कवितायेँ पढूंगा .सीखूंगा ऐसा लिखनें का हुनर …………

    achyutamkeshvam के द्वारा
    March 4, 2016

    मैं इतना काबिल नहीं आपकी गुण ग्राहकता है .

Jitendra Mathur के द्वारा
January 25, 2016

यह गीत है या किसी के पावन प्रेम की सरिता ? किसी की भावनाओं का सागर ? किसी के हृदय में बंद पड़ी लेकिन खुलने को आतुर नेहपगी बातों की पुस्तक ? आह ! इस गीत का वास्तविक मूल्य तो कोई सच्चा प्रेमी ही आँक सकता है । यह वह गीत है जिसे सुनकर किसी के मन का मयूर  नाच उठे तो किसी के नेत्रों में किसी की स्मृतियों के मेघ उमड़ें और फिर बरस पड़ें । जी कर रहा है कि इस गीत को किसी मधुर धुन पर बार-बार गाऊं और गाकर उसे सुनाऊं जिसे इसके शब्द संबोधित करते हैं ।

    achyutamkeshvam के द्वारा
    February 1, 2016

    आपके उत्साहवर्धन के लिए आभार ,स्नेह अनवरत बनाएं रहें .

rameshagarwal के द्वारा
January 18, 2016

जय श्री राम अचुतयम जी बहुत अच्छी कविता इस क्षेत्र में आपका कोइ जोड़ नहीं बार आनंद आया पढ़ कर.साधुवाद

    achyutamkeshvam के द्वारा
    January 19, 2016

    आभार भाई


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