Achyutam keshvam

हम समय शम्भु के चाप चढ़े सायक हैं. हम पीड़ित मानवता के नव नायक हैं हम मृतकों को संजीवन मन्त्र सुनाते हम गीत नहीं युग गीता के गायक हैं

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ढल गई है साँझ दिन का थका हलवाह सोना चाहता है

Posted On: 31 Oct, 2015 Others,social issues,कविता,Hindi Sahitya में

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ढल गई है साँझ
दिन का थका हलवाह
सोना चाहता है
-
भूल उस अल्हड़ किरन को
कि जिसने
भोर में था
गुदगुदा उसको जगाया
-
और वह
श्यामल सलोनी छाँह
कसमसाती सी
कुँए के जगत वाली
कि जिसकी
ओढ़नी को शीश पर धर
तप्त दोपहरी की
उस तीखी लपट में भी
सकौतुक
वह तनिक सा मुस्कराया
-
अब
काली निशा में
उर्वर बीज सपनों के
कि जो
अँकुआ उठेंगे
कल
उषा अनुरागिनी का
स्पर्श पाकर
मौन और चुपचाप
बोना चाहता है
-
ढल गई है साँझ
दिन का थका हलवाह
सोना चाहता है …….



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
March 5, 2016

आपकी तो प्रत्येक कविता हृदय की तलहटी में कहीं पहुँचकर किसी बिन्दु को ऐसे स्पर्श करती हैं कि सकल व्यक्तित्व आप्यायित हो जाता है, तरलित हो जाता है, पावन हो जाता है । क्या कहूँ आपकी कविताओं के लिए ? स्वयं को इस योग्य ही नहीं पाता मैं ।

    achyutamkeshvam के द्वारा
    March 9, 2016

    धन्यवाद

Bhola nath Pal के द्वारा
February 22, 2016

कैसे हैं लोग , आपको पढ़ते क्यों नहीं .बहुत अच्छा लिखते हैं आप……

    achyutamkeshvam के द्वारा
    March 4, 2016

    पढ़ते हैं.आपने पढ़ा ,आपका आशीष चाहिये


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