Achyutam keshvam

हम समय शम्भु के चाप चढ़े सायक हैं. हम पीड़ित मानवता के नव नायक हैं हम मृतकों को संजीवन मन्त्र सुनाते हम गीत नहीं युग गीता के गायक हैं

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यह अधखिली कली पाटल की इसको मेरा ह्रदय समझना

Posted On: 4 Feb, 2015 Others,लोकल टिकेट,कविता में

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यह अधखिली कली पाटल की
इसको मेरा ह्रदय समझना।
-
सावन में बादल तो उमड़े,
आँगन कभी भिगो ना पाये।
मन-मन्थन के गीत-रतन वे,
शायद ही ओठों तक आये।
न्यास-ध्यान-मुद्रा तक सिमटी
रही साधना प्रेमालय की।
आवाहन के साम छंद का,
प्राण न उच्चारण कर पाये।
मौन-मुखर ध्वनि सी पायल की,
मेरी भाषा-विनय समझना ।
यह अधखिली कली पाटल की
इसको मेरा ह्रदय समझना।
-
कंठ तलक कंटकमय जिसको,
स्वयं विधी ने वसन उढ़ाये।
सहज प्रश्न है सखी तुम्हारा,
उसको कैसे गले लगायें।
पलभर इन शूलों को भूलो,
मेरी मदिर गंध में झूलो।
प्रेम राम का पूत नाम है,
जीवन शूल नमित हो जाये।
आँखो में रेखा काजल की,
मुझे निकट इस तरह समझना।
यह अधखिली कली पाटल की
इसको मेरा ह्रदय समझना।
-
मुझे न अभिलाषा तुलसी की,
प्रिय मैं शालिकराम नहीं हूँ।
जो अक्षत प्रत्यंचा चाहे,
वह अचूक संधान नहीं हूँ।
मैने तपोवनों में जाकर,
ढूँढ़ी है शाकुन्तल बाहें।
शत-प्रतिशत धरती का वासी,
मानव हूँ,भगवान नहीं हूँ।
रखना याद गली पागल की,
द्वार खुला हर समय समझना।
यह अधखिली कली पाटल की
इसको मेरा ह्रदय समझना।
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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
July 12, 2016

एक सच्चा प्रेमी ही इस भावुक कविता का वास्तविक मूल्य आँक सकता है जो कवि के हृदय की तलहटी से उठी प्रतीत होती है । आह ! नयन सजल हो गए हैं पढ़कर ।

    achyutamkeshvam के द्वारा
    July 13, 2016

    आभार सर जी

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
February 8, 2015

अच्युतम केशवं …राम नारायरणम् ………….मैने तपोवनों में जाकर, ढूँढ़ी है शाकुन्तल बाहें। …मुझे न अभिलाषा तुलसी की, प्रिय मैं शालिकराम नहीं हूँ।……बस धैर्य रखो ……………ओम शांति शांति

    achyutamkeshvam के द्वारा
    February 11, 2015

    सादर धन्यवाद

February 6, 2015

sundar abhivaykti .badhai.

    achyutamkeshvam के द्वारा
    February 11, 2015

    सादर धन्यवाद जी


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